Kuldevi Bayanji Dhaam Bayla

||श्री गणेशाय नमः||

||श्रीआवड़ माताजी के बायांजी रूप का संक्षिप्त इतिहास||

महादा जी के पुत्र मामड़जी चारण के संतान नहीं हुई तो सिन्ध जाकर हिंग्ळाजमाताजी के दर्शन कर संतान की कामना की थी। मामड़जी-मोहवतीजी के घर हिंग्ळाजमाताजी का पुत्री रूप में संवत 808 चेत्र सुद नवमी को अवतरण हुआ और इनका नाम आवड़ रखा गया। इनका जन्म स्थान राजस्थान के बाड़मेर जिले की धोरीमन्ना तहसील से 6 कोस दूर चाळकनूं गांव माना जाता है। मामड़जी के सात पुत्रियां एवं एक पुत्र हुआ जिनका नाम क्रमश: आवड़, आशी, सेसी, मेहली , हुली, रुपां, लांगदे एवं पुत्र का नाम महिरक्ख था। सातों बहिने शक्ति की अवतार मानी जाती हैं इसलिए कई मंदिरों में सातों बहिने एवं भाई महिरक्ख की मूर्ति एक साथ है और इनकी एक भुजा पर सोनचिड़ी पक्षी है।कई जगह इनकी अलग-अलग मूर्तियां भी हैं। इन्होंने कई हूँण दैत्यों का वध किया था । इनके 52 नाम, 52 मंदिर ओरण (गोचर-भूमि) सहित है। श्रीआवड़जी ने बचपन में बोरड़ी के पेड़ पर झूला, हिंडोला डाला था इसलिए इनके मंदिर में प्राय: बोरड़ी का पेड़ होता है। तेमड़ाराय, तनोटराय, सांगिया या स्वांगिया, भादरियाराय, घंटियालराय,डूंगरराय या डूंगरेचियां, देगराय, आईमाता, कतियांणीमाता आदि कई नामों से विशाल मंदिर जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर ,जोधपुर ,सिरोही, पाली आदि जिलों में बहुत है।जैसलमेर क्षेत्र का प्राचीन नाम माढदेश था इसलिए श्रीआवड़ माताजी का एक नाम माढराय है । सातों बहनों ने एक बार नागिनों का रूप धारण किया था इसलिए इनका नाम नागणेचीमाता भी है। देशनोक की श्रीकरणी माताजी ने भी अपने जन्म स्थान सुवाप में श्रीआवड़ माताजी की पूजा की थी और मंदिर बनवाया था जो कि आज भी मौजूद है।

जैसलमेर से 120 किलोमीटर दूर लोंगेवाला पोस्ट पर श्रीतनोटराय माता एवं घंटियालराय माता के मंदिर हैं, इन मंदिरों की पूजा सीमा सुरक्षा बल BSF के जवान करते हैं। वे इनको अपनी आराध्य देवी मानते हैं क्योंकि सन 1965 एवं 1971 के युद्ध में इन देवियों ने इस क्षेत्र में विजय दिलाई थी,ऐसा वो मानते हैं । पाकिस्तान की ओर से इन मंदिरों पर डाले गए बमों में से एक भी नहीं फटा था।कई बम श्रीतनोटराय माता मंदिर में सुरक्षित आज भी रखे हुए हैं । श्रीआवड़ माताजी जैसलमेर क्षेत्र के भाटी राजपूतों की कुलदेवी है । संवत 1316 में भाटी राजपूतों से जो नयी जाति कुंबावत- क्षत्रिय, मारू-राजपूत, मारू- कुंबार बनी उसके निम्नलिखित गौत्रों की कुलदेवी श्रीआवड़ माताजी है:- बोरावड़, मंगलराव, पोहड़, लीमा , खुडिया, भाटिया, माहर, नोखवाल, भीड़ानिया, सोंकल, डाल, तलफीयाड़, भाटीवाल, आईतान, जटेवाल, मोर, मंगलौड़ आदि।

सात बहनों का श्रीबायांजी-धाम नाम का एक प्राचीन शक्ति पीठ राजस्थान के चूरू जिले के सरदारशहर तहसील से 24 किलोमीटर दूर पश्चिम में सरदारशहर से लूणकरणसर मार्ग वाया बायला गांव की 500 बीघा औरण-भूमि में स्थापित है। जिनराजसिंहजी खींची-राजपूत को श्री बायांजी महाराज ने साक्षात दर्शन दिए थे और उनके द्वारा बताए गए स्थान पर संवत 1441 चेत्र सुद 13 को मंदिर निर्माण हेतु भूमि-पूजन किया गया तो वहां श्रीबायांजी की स्वयंभू -मूर्ति (देवळी) प्रकट हुई थी। मंदिर में देवळी की विशेष पूजा विजयदशमी को होती है । श्रीबायांजी धाम पक्की सड़क से जुड़ा हुआ है । आसोज एवं चेत्र नवरात्रि में मेला भरता है। बच्चों के जात, झड़ूले पूरे साल शुक्ल पक्ष में होते हैं । हिंदू, ओसवाल, माहेश्वरी, अग्रवाल आदि जाति के लोग बच्चों के लिए श्रीबायांजी धाम में मन्नतें मांगते हैं और मन्नत, मनोकामना पूर्ण होने पर कई भामाशाह धाम के पास धर्मशाला, गेस्ट हाउस का निर्माण अपने प्रिय-जनों की याद में करवाते हैं। चूरु जिले में श्रीबायांजी के उपासकों द्वारा प्राय: अपने बच्चों के गले में सात बायांजी का चांदी या सोने का फूलड़ा- मूरत पहनाने का रिवाज है। शक्तिपीठ-धाम के आसपास के कई गांवों के लोग रात्रि के शांत वातावरण में श्रीबायांजी का ज्योति-रूप पालणा आकाश में विचरण करता देखते हैं । पालणे से घूंघरूओं की आवाज भी सुनाई देती है। श्रीबायांजी की चमत्कारिक धरोहर कुआं की चाठ आज भी मौजूद है। सफ़ेद घोड़ा जिस स्थान पर रुका था वहाँ कुआं बना हुआ है।श्रीबायांजी धाम के वर्तमान पूजारी खींची राजपूत गंगासिंहजी के पुत्र लक्ष्मणसिंहजी ने धाम की भूमि – पूजन की उक्त संवत की जानकारी मुझे दी थी । मैं आभारी हूँ।

उपरोक्त भाषा , शैली मेरी स्वंय की है । श्रीबायांजी महाराज के उपासकों के लिए दो शब्द लिखे है। आप अपने मित्रों में इंटरनेट के माध्यम से यह जानकारी जरूर शेयर करें ।

||श्रीबायांजी धाम की जय हो||

Nagraj Maahar From Chennai (TN)

Dt: 07-10-2021

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